इस बार पोला पर्व पर छह सितंबर को नहीं दौड़ेंगे जय-बीरू, सलमान-शाहरुख नाम के बैल…

HEERA MANIKPURI

हर साल पोला पर्व पर रावणभाठा मैदान, भाठागांव में बैल दौड़ प्रतियोगिता का भव्य आयोजन होता आया है। प्रतियोगिता में किसान जय-बीरू, सलमान, शाहरुख जैसे नाम वाले बैलों की जोड़ियों को लेकर आते थे और उन्हें दौड़ाते थे। इस साल कोरोना महामारी के चलते प्रशासन ने बैल दौड़ प्रतियोगिता में सीमित दर्शकों के शामिल होने की शर्त रखी थी। इसे देखते हुए आयोजन समिति ने बैल दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन नहीं करने का फैसला लिया है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी समिति एवं बैल दौड़, बैल श्रृंगार प्रतियोगिता के संयोजक माधवलाल यादव ने बताया कि प्रशासन ने 200 दर्शकों के शामिल होने का हवाला दिया। चूंकि बैल दौड़ प्रतियोगिता को देखने के लिए हजारों दर्शक उमड़ते हैं, उन दर्शकों को भला हम कैसे रोक सकते हैं? ज्यादा दर्शक आने पर समिति को जिम्मेदार ठहराया जाता, इसलिए समिति द्वारा आयोजन नहीं किया जा रहा है।

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छह सितंबर को पोला पर्व पर बैलों का श्रृंगार करके पूजा-अर्चना करने की सालों से चली आ रही परंपरा निभाई जाएगी। बैलों की पूजा करके छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। साथ ही बैल मालिकों का सम्मान किया जाएगा।

धान के पौधों में भरता है दूध

महामाया मंदिर के पुजारी पं. मनोज शुक्ला के अनुसार भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला पोला पर्व खरीफ फसल के द्वितीय चरण का कार्य (निंदाई कोडाई) पूरा हो जाने तथा फसलों के बढ़ने की खुशी में मनाया जाता है। किसान अपने बैलों की पूजा करके आभार जताते हैं। पोला पर्व की पूर्व रात्रि को गर्भ पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन फसल गर्भ धारण करती है अर्थात धान के पौधों में दूध भरता है। इसी कारण पोला के दिन किसी को भी खेतों में जाने की अनुमति नहीं होती।

रात्रि में देव स्थापना करेंगे बैगा

पं. चंद्रभूषण शुक्ला ने बताया कि पोला के एक दिन पहले 5 सितंबर की रात गांव के मुखिया, बैगा गांव के देवी देवताओं की पूजा करेंगे। रात भर चलने वाली पूजा में वह व्यक्ति शामिल नहीं होता, जिसकी पत्नी गर्भवती हो। 6 सितंबर को सुबह घर-घर में गुडहा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खूरमी, बरा, मुरकू , भजिया , मूठिया , गुजिया, तसमई आदि छत्तीसगढी व्यंजन बनाकर भोग लगाएंगे।

घुंघरू, घंटी, कौड़ी से श्रृंगार

बैलों को स्नान करवाकर सींग, खुर में नेल पालिश करके गले में घुघरू, घंटी या कौडी से बने आभूषण पहनाएंगे।

युवतियां गांव के बाहर मैदान या चौराहों पर (जहां नंदी बैल या साहडा देव की प्रतिमा स्थापित रहती है) पोरा पटकने जाएंगी। एक-एक मिट्टी के खिलौने को पटककर-फोड़ेंगी।

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