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बिलासपुर हाईकोर्ट का आदेश- गंगरेल बांध के भूमिहीन परिवारों को 3 माह में पुर्नस्थापित किया जाए

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बिलासपुर

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने गंगरेल बांध के भूमिहीन परिवारों को 3 माह में पुर्नस्थापित करने का आदेश दिया है।

  • धमतरी में भिलाई स्टील प्लांट को पानी देने के लिए साल 1972-78 में बनाया गया था बांध
  • 55 गांव के 8440 आदिवासी परिवार हुए थे प्रभावित, मुआवजा तो मिला, लेकिन रहने को जमीन नहीं

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से 48 साल बाद गंगरेल बांध के भूमिहीन परिवारों को न्याय मिला है। कोर्ट ने सोमवार को आदेश जारी कर 55 गांव के 8440 आदिवासी परिवारों को 3 माह में पुनर्स्थापना किए जाने के आदेश दिए हैं। भिलाई स्टील प्लांट को पानी देने के लिए साल 1972-78 में धमतरी में बांध बनाया गया है। इसके बाद से ही परिवार विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। मामले की सुनवाई जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव की एकलपीठ में हुई।

गंगरेल बांध प्रभावित जन कल्याण समिति अध्यक्ष महेंद्र कुमार उइके और उससे जुड़े एक हजार परिवार ने साल 2007 में अधिवक्ता संदीप दुबे के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने बताया कि गंगरेल बांध से प्रभावित होने वाले 98 फीसदी आदिवासी परिवार से हैं जो हजारों साल से वहां रह रहे थे। साल 1972 से बांध का काम जब शुरू हुआ तब से विस्थापित हैं। उनको मुआवजा तो मिला लेकिन पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गई।

1978 से आंदोलन शुरू हुआ, हर बार आश्वासन ही मिला
कोर्ट को बताया गया कि 1978 से पुनर्वास के लिए आंदोलन चल रहा है, लेकिन हर बार प्रशासन व सरकार से सिर्फ आश्वासन ही मिला। अधिवक्ता ने नर्मदा बचाओ आंदोलन और एनडी दयाल मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि पुनर्वास ऐसा होना चाहिए कि वे पहले से बेहतर जीवन यापन कर सकें। यह उसका मूलभूत अधिकार है, जो संविधान में मिला है।

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। कहा, राज्य में पुनर्वास पॉलिसी 2007 में बनी है, लेकिन लोक कल्याणकारी सरकार है। इसलिए इस पॉलिसी में गंगरेल बांध प्रभावितों के लिए विस्तारित कर रहे हैं। साथ ही कहा कि 40 साल पुराना मामला है। देरी से याचिका प्रस्तुत करने के कारण इसे निरस्त किया जाना चाहिए। उस समय पुनर्वास के लिए कोई पॉलिसी नहीं थी।

दुर्ग, धमतरी व कांकेर कलेक्टर से सामंजस्य बनाकर दें भूमि
सभी पक्षों को सुने के बाद कोर्ट ने कहा, जब भी बांध बने हैं विस्थापित परिवार को दुख झेलना पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के विस्थापितों के बेहतर जीवन में लाने के आदेश के तहत ही इस मामले में भी सरकार को काम करना चाहिए। कोर्ट ने राजस्व, आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव को कलेक्टर दुर्ग, धमतरी और कांकेर कलेक्टर से समन्वय बनाकर परिवारों को भूमि उपलब्ध कराने कहा है।

देश के सबसे बड़े बांध विस्थापितों के लिए 13 साल चली सुनवाई
महानदी पर 15 किमी में बना यह बांध देश में सबसे बड़ा और लंबा माना जाता है। इसमें 15 हजार क्सूसेक जल धारण क्षमता है। यहां 10 MV क्षमता की गंगरेल हाइडल पावर प्रोजेक्ट नाम से एक परियोजना संचालित है। मामले में 13 साल तक लंबी बहस और सुनवाई चलने और सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने 16 जनवरी को फैसला सुरक्षित किया था। वहीं फैसला 16 दिसंबर को सुनाया गया।

CM के लिखित आश्वासन, कैबिनेट के निर्णय के बाद भी पुनर्वास नहीं हो पाया
पहले आंदोलन के बाद 1978 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी ने लिखित में 15 फीसदी अतिरिक्त राशि और जमीन देने का आश्वासन दिया। वहीं 2007 में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कैबिनेट बैठक कर कई लाभ देने का निर्णय लिया, लेकिन इसके बाद भी पुनर्वास नहीं हो पाया। देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए आंदोलनकारी बांध के पानी में गले तक डूब कर विरोध कर चुके हैं।

एक गांव बना वहां भी सुविधा अधूरी है
विरोध और आंदोलन के बाद साल 1978-84 के बीच गंगरेल बांध प्रभावितों के लिए एक गांव जोगीडीह बसाया गया। यहां 100 परिवारों को 2-2 एकड़ जमीन दी गई, लेकिन यहां पहले से दूसरे लोग काबिज थे। यहां आधे-अधूरे व्यवस्था के बीच लोग जीवन यापन कर रहे हैं। सड़क, स्कूल 2004 में बन पाई, अस्पताल व दूसरी सुविधाओं के लिए अभी भी यहां के लोग संघर्ष कर रहे हैं।

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